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मधेश बहुत जल्द भारत का पडोसी राष्ट्र बनना चाहता है : कैलाश महतो

Written By news on Wednesday, 10 August 2016 | 22:06


वर्ल्ड गिनिज बूक के भी रेकर्ड तोड मधेश का आन्दोलन होना निश्चित है । मधेश आन्दोलन को डेढ महीने हो गये हैं और अभी भी यह जारी है । रुकने का नाम नहीं ले रहा है । मधेश और मधेशी जनता के भोट पर राज करने तथा नेपाली राज के गुलामी करके जिन्दा रहने बाले कुछ नेता, व्यापारी तथा व्यतिगत फायदे के आदि रहे निर्लज्ज बुद्धिजिवियों के अलावा आम मधेशी; वे चाहे किसान हाें, मजदुर हाें, समान्य रोजीरोटी करने बाले हों, विद्यार्थी हों, युवा हों, यातायात व्यवसायी हों, रिक्सा चालक हों, सारे नेपाली राज्य और शासन से पीडित लोग, वर्ग और समुदायों ने इस मधेश आन्दोलन को तन, मन और धन के साथ साथ खून तक देने से नहीं घबरा रहे हैं, जो अपने आप में मधेशियों की वीरता का बेमिशाल पहचान है ।

कञ्चनपुर से झापा तक के मधेश दौडे के दौरान  हम से मिलने बाले कई सम्भ्रान्त कहलाने बाले लोगों से मधेश के युवा तथा विद्यार्थी लगायत के लोगों को मधेश के हक हित के बारे में जानकारी करबाने के लिए मैंने अनुरोध किया था । जबाव में उन सम्भ्रान्तों के तरफ से सुनने को मिलता था कि कोई मधेशी मैदान में नेताओं के लिए आने को तैयार नहीं हैं । हमने जब उन्हें वे नेताओं के लिए ना सही तो अपने तथा अपने आने बाले सन्तानों के लिए उन्हें लडना पडेगा बोलता रहा तो उनका फिर से वही जबाव, जैसे वे उनके ठेकेदार बन बैठे हों ।

वैसे दुनियाँ के किसी भी आजादीय और अधिकारीय आन्दोलन में अपवादों के बाहेक कोई शहरीया बाबु, व्यापारी घराने या मौसम के दिवाने बुद्धिजिवी लोग सामेल नहीं होते । होने बाले लोगों को भी वे त्रसित करते रहते हैं, क्यूँकि गरीबों में फैलने बाले त्रासों से उन्हें कम से कम दो फायदे निश्चित होते है : पहला, वो यह नहीं चाहते कि कोई किसान या मजदुर नेता या आन्दोलनकारी बनकर उनके समानान्तर खडे हो पाये । दूसरा यह कि वे लोग हमेशा राज्य के करीब में रहकर राज्य की चाकरी करते हैं और बदले में राज्य उन्हें किसी भी रास्ते से कमाने का रास्ता देती है और दोनाें मिलकर गरीबों पर शासन करते हैं । वे हमेशा चाहते हैं कि गरीब लोग आन्दोलन से दूर ही रहें । मगर इनके बावजद भी वही किसान, मजदुर, विभेदित, शोषित, पीडित, अल्पसंख्यक, महिला आदियों को आन्दोलित होना पडता है । वे आन्दोलित होते हैं, कुर्बानियाँ देते हैं, शहादत देते हैं, घायल और अपांग होते हैं, क्यूँकि उनमें एक बदले की भावना कहीं न कहीं जागृत रहती है । वे जहाँ भी जाय, जो भी काम करें, जितना भी अच्छा करें, जितना भी इमानदार हों, हर जगह उन्हें बेइज्जती ही मिलती है, तिरस्कृत होते हैं, शोषित होते हैं और गालियाँ सुनना पडता है । सरकार शोषण करती है, ट्याक्स लगाती है और व्यापारी तथा नौकरशाही उन्हें नीच निगाहों से देखती है और उन्हीं विभेद और दुव्र्यवहारों से वे बचने के लिए वे आन्दोलित होते हैं । मगर दुर्भाग्य कि फिर यह होता है कि जब उनकी संघर्ष सफलता के तरफ बढने लगता है तो वही सरकारी पार्टी और नेता, व्यापारी तथा बुद्धिजिवी उनके आन्दोलनों का अगुवा बन जाते हैं और बडे चालाकी पूर्वक उन आन्दोलनों से फिर नयी उँचाई प्राप्त कर लेते हैं और औसतन वे भोलेभाले निर्दोष किसान तथा मजदुर लोग वहीं के वहीं. रह जाते हैं । फिर वही से वही शोषण, भ्रष्टाचार, घुसखोरी, नातावाद, जातिवाद, कृपावाद, पैसावाद, शराबवाद, वेश्यावृतिवाद, ऐयाशिवाद, आदि की कहानी शुरु होती है ।


मधेश में जारी मधेश आन्दोलन भी उसीका पूनरावृति है । आत्मनिर्णय के अधिकार साथ संघीयता सहित के संविधान बनाने के लिए काठमाण्डौ गये मधेशी सभासदों ने सारा समय पार्टी फोडने तथा फोडबाने, एक दुसरे को उन्हीं नेपालियों के सामने नीचे दिखाने, उनके चाकरी में लगकर मन्त्री बनने, मालपानी खाने, रंगरेलियाँ मनाने, जेटों में शैर करने आदि में समय बिताया । संघीय संविधान बनाने हेतु बनाये गये संवैधानिक समितियों के बैठकों में मधेशी दलों के सभासदों की उपस्थिति १८ प्रतिशत होने तथा संघीयता विरोधी पार्टियाँ तथा उनके नेताओं की उपस्थिति उन समितियों में १०० प्रतिशत होना, आठ वर्षों तक बनाये गये संवैधानिक मस्यौदा के बारे में १६ बूँदे सहमति–पत्र तथा संविधान का पहला मस्यौदा आने के बाद मधेशी जनताद्वारा विरोध होने पर मधेशी दल तथा उनके नेताओं को पता चलना क्या संकेत करता है ? मधेशी जनता जब आन्दोलित हुई तो स्वस्फूर्त भडके मधेश आन्दोलन में मधेशी नेताओं का घुसपैठ होना शुरु हआ । लेकिन अभी भी मधेश के तीन वर्ग खामोश हैं : १.शहरिया, २.व्यापारी ३.बुद्धिजिवी, और सम्भवतः इस प्रतिक्षा में हैं कि आन्दोलन ज्यों ही सफलता की सकारात्मक मोड लेगी, वे प्रवेश कर लेंगे ।

डेढ महीने के मधेश आन्दोलन में नेपाली राज्य के अनुसार ४३ मधेशियों की जानें गयी है, जबकि आम मधेशीजन का मानना है कि कैलाली के टिकापुर में राज्य ने १२८, भैरहवा–बेलहिया के आन्दोलन में ८ और रुपन्देही के ही बेथरी में ५० से उपर मधेशियों की हत्या हुई है । टिकापुर के कई गाँव आज भी पुरुषों से खाली पडा है । ताज्जुब है कि इतने भारी संख्या में जान गँवाने के बाद भी मधेशी जनता आन्दोलन करने से नहीं डर रही है । दिनहुँ लाखों लोग सडक पर अपने अधिकार के लिए आ जाते हैं । उन्हें एक पैसे का कहीं से कोई सहयोग प्राप्त नहीं है । अपने घर से सूखे रुखे खाकर आन्दोलित हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि जनता का आन्दोलन पैसों से नहीं, आत्मनिर्णय से ही होता है ।

आन्दोलन में रात दिन भाग लेने बालों में से ८० प्रतिशत से ज्यादा मधेशी जनता स्वतन्त्र मधेश घोषणा की माँग कर चुकी है । जनता के उसी मानसिकता को अपने तरफ आकर्षित करने हेतु नेता लोग स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के आजादी बाले गीत भी सभामञ्च तथा अन्य कार्यक्रमों के दौरान लगा देते हैं और बहुत सारे नेतागण भी अब की आन्दोलन स्वराज की कहकर भाषण दे देते हैैं । ८० प्रतिशत जनता की माँग और नेताओं की अभिव्यति समेत को सम्मान करते हुए स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन ने लिखित रुप से ही सम्पूर्ण मधेशी दल के केन्द्रिय तथा जिला पार्टी एवं नेताओं को स्वतन्त्र मधेश का अन्तरिम संसद तथा अन्तरिम सरकार घोषणा करने के लिए आव्हान किया है, क्यूँकि गठबन्धन की सारी तैयारी अभी पूर्ण नहीं हो पायी है । मगर मधेशी जनता के माँग और इच्छा के विपरीत व्यर्थ आन्दोलनों का रुटिन बनते जा रहे हैं ।

कुछ जानकारों को माने तो मधेशी नेता लोग भी आजाद मधेश के पक्ष में हैं । मगर उनके इच्छा के बावजुद वे यह नहीं कर सकते, क्यूँकि उनकी अरबों खरबों की सम्पति उसी काठमाण्डौ के शितल बैंकों तथा महल व्यापारों में मौजुद है, जिसे वे मधेश में लाना नहीं चाहते ।

कुछ दिनों के भितर भारत ने भी नेपालियों से बेइज्जत होने का बडा सुनहरा मौका पाया है । आजतक उसे यही लग रहा था कि नेपाल और नेपाली हमारा खा कर जिने बाला इमानदार गुलााम है । उसे यह पता ही नहीं चला दो ढाई शताब्दियों में भी कि जिसे वह खिला पिलाकर मजबूत बना रहा है, वह एक विशैला साँप भी है । जिस भारत ने नेपालियों को देश बना दिया, मधेश को गुलाम बनाने में नेपालियों को सहयोग किया, झूठ का प्रमाण दिलवाकर मधेश को नेपाल के अधीन कर दिया, आज उसी भारत को चौवन्नी अठन्नी में अपना अमूल्य सम्पति बेचने बाले नेपाली धम्की देने लगे हैं इसलिए कि भारत से सटे मधेश में हो रहे अत्याचारों को मिटाने के लिए उसने बात उठायी जो पूर्णतः जायज है एक पडोसी के लिए । ना नुकुर के साथ नेपाल के विरुद्ध नाकाबन्दी करने का उद्देश्य जो भी हो, लेकिन भारत मधेश के प्रयोग से अब नेपालियों से लेनदेन का सारा नाता तोडें, यह मधेश अनुरोध करता है । पडोसी के नाते मधेश को छोडकर नेपाल से नयें रिस्ते कायम करें । मधेश बहुत जल्द भारत का भी पडोसी देश बनना चाहता है । अन्तर्राष्ट्रिय कानुन तथा मानवाधिकार के मापदण्डों को अपनाकर स्वाभाविक और स्वतन्त्र सोंच के साथ मधेश को आजाद राष्ट्र के रुप में मान्यता मिले, यह कामना संसार के समस्त राष्ट्रों के साथ साथ लोकतान्त्रिक भारत से भी रहेगी ।





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